- धनञ्जय सिंह
- कविता / ग़ज़ल
अकुलाये सिंह-व्याघ्र-चीते
प्रहर-दिवस, मास-वर्ष बीते
जीवन का कालकूट पीते.
पूँछें उपलब्धियाँ हुईं
खेलते हुए साँप-सीढ़ी
मंत्रित-निस्तब्ध सो गयी
प्रहर-दिवस, मास-वर्ष बीते
जीवन का कालकूट पीते.
पूँछें उपलब्धियाँ हुईं
खेलते हुए साँप-सीढ़ी
मंत्रित-निस्तब्ध सो गयी
आग पर पानी
डालकर
राख सुलगाते हैं
कितने कमजोर
हैं, हम जो नाहक
डरकर भाग जाते हैं।
स्मृतियों के वातायन से,
झाँक- झाँक कर मुझे रिझाते।
भावों के झरने नि:सृत हो,
तृषित अधर की प्यास बुझाते।।
रंग सारे उदास पानी के,
बस रहें आस-पास पानी के।
ओक भी है उदास औ' लब भी,
प्यास बैठी है पास पानी के।
हमसे मौसम ने कहा हमने निकाली चादर
जिसमें पुरखों की बसी गंध संभाली चादर
दिन में पूरी थी मगर रात अधूरी - सी लगी
सिर पे खींची तो कभी पांव पे डाली चादर
मेरे आगे वो मंज़र आ रहे हैं।
वो ख़ुद चलकर मेरे घर आ रहे हैं।।
मैं सहराओं के जंगल मे खड़ा हूँ
सफीने पर बवण्डर आ रहे हैं।।
जो हमेशा बज़्म का हिस्सा रहे हैं
ये समझ लो उम्र भर तन्हा रहे हैं
तुम समझना चाहते हो रुख़ हवा का
हम हवा को रास्ता समझा रहे हैं
तुम दरबारों के गीत लिखो
मैं जन की पीड़ा गाऊँगा.
लड़ते-लड़ते तूफानों से
मेरे तो युग के युग बीते
कभी सोचा है स्त्री भी एक पौधा ही है --
पर स्त्री को नहीं दिया जाता है इतना सत्कार ...
एक पौधे को रोपने के बाद दिया जाता ...
खाद पानी और रौशनी भी ---
सहसा बारिश में सर्द हवा,
आरंभ निशा का हुआ रवां,
वीभत्स ध्वनि में शोर मचाने,
मचले पंछी तब घर को जाने,
तृषा तृप्ति के जलद घनेरे
और शब्द चातक बहुतेरे
गीत हुए ।
बादल आँख मिचोली खेले आंचल फटा बटोरे धूप
छप्पर आसमान सिर ढोए काल डस गया काया रूप ।
हौले पवन बुहारे आंगन द्वार देहरी एक समान ,
रिश्ते डूब गए पानी में अपनों ने छीनी मुस्कान।
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