- डॉ रामशंकर चंचल
- कथा-कहानी
काली
शांत जंगल, ऊची, ऊंची पहाड़ियों और उसी पर संकरी पगडंडी का रास्ता जो देवला की झोपड़ी को जाता है। देवला के साथ उसकी पत्नी और दो बच्चे काली और थावरिया भी रहते हैं।
शांत जंगल, ऊची, ऊंची पहाड़ियों और उसी पर संकरी पगडंडी का रास्ता जो देवला की झोपड़ी को जाता है। देवला के साथ उसकी पत्नी और दो बच्चे काली और थावरिया भी रहते हैं।
“अनिल, सुनो ना”
“हाँ, कहो”
“हमें कम से कम अब तो मॉम डैड से मिलने जाना चाहिये | पाँच वर्ष हमारे विवाह को हो गए?|
शायद, अब वे मान जाएँ और हमारे प्रेम को समझ सकें |”
जिम्मेदारियों के पहाड़ ने मनोहर लाल को बीमार कर डाला उनको रात दिन जवान बेटी की शादी और शिक्षित बेटे की नौकरी की चिंता सुकून नहीं लेने दे रही थी।
भिलांचल झाबुआ का छोटा सा कस्बा रामनगर ,जहाँ चार खम्भो पर टिकी बांसों की झोपड़ी में सोमला अपने बुजुर्ग माता पिता के साथ रहता था। सोमला जवान था किंतु निरक्षर जिसे अ अनार का भी याद नहीं।अपनी झोपड़ी के समीप उसका छोटा सा खेत था।
आज अचानक मेरे मित्र का वीडियो कॉल आया और मैं सो कर भी नहीं उठी थी इसलिए मैंने फोन नहीं उठाया। लेकिन जब देखा तो खुद को रोक नहीं पाए और रजाई को पलटकर ब्रश करके तुरंत नीचे हॉल में जाकर उन्हें फोन लगा ही दिया।
घोर कलयुग आ गया है ।एक ही बेटा है और कुछ कमी भी नहीं है,इतनी ज़मीन-जायदाद..... ...?
"राम-राम ऐसा अनर्थ तो न कभी देखा,न सुना।
पहली बार ऐसा अनोखा खेल अपने समाज़ में हो रहा है।
"यार, क्या हॉट लड़की है प्रिया, अब और रहा नहीं जाता; हमें उसका आने जाने का रूटीन पता तो है ही, तो क्यों ना कल उसे किडनैप कर अपनी अपनी प्यास बुझाए?, बोलो क्या कहते हो सब?" मयंक ने अपने दो दोस्तों आलोक और विनय से एक गन्दी हंसी के साथ पूछा।
‘तुम फिर आ गईं अम्मा?’- डाकखाने के बड़े बाबू ने उस बुढ़िया को दुत्कारते हुए कहा जिसके बदन पर एक सफ़ेद मामूली-सी धोती थी।
डमरू ने कागज में लिपटा एक पैकेट नुमा सामान मेरी ओर बढ़ाया और याचक मुद्रा में देखने लगा।
मुझे समझ नहीं आ रहा था कि वह मुझसे क्या चाहता है।
....बात जंगल के राजा की थी लिहाजा फैसला हो गया। जंगली झाड़ियों को जलाने के लिए जंगल में आग लगाई जाएगी ताकि जंगल साफ सुथरा दिखे और जंगली जानवर उनमें उलझकर घायल न हों..
बाहर से लौट कर गेट खोला, तो भीतर कुछ पत्र पड़े। दो लिफाफे और बाकी पोस्ट कार्ड थे। पत्र जब चलन से बाहर हो चले हों, ऐसे समय में इन पत्रों का आना, मेरे लिये किसी नेमत से कम नहीं था। उन्हें उठाकर टेबल पर रखने लगी तो, एक पोस्टकार्ड ने मेरा ध्यान खींचा।
जीने के लिए रोटी
हँसने के लिए चाँद
चाहिए
चाँद छोड़ती हूँ
तो रोटी तो मिलती है
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