....बात जंगल के राजा की थी लिहाजा फैसला हो गया। जंगली झाड़ियों को जलाने के लिए जंगल में आग लगाई जाएगी ताकि जंगल साफ सुथरा दिखे और जंगली जानवर उनमें उलझकर घायल न हों..
ये बात सही थी कि कभी कभार कुछ जानवर इन झाड़ियों में उलझकर लहूलुहान भी हो चुके थे मगर ये भी हकीकत थी कि बहुत सारे जानवरों का इनमें बसेरा था तो कुछ को भोजन भी इन्हीं झाड़ियों से मिलता था ऐसे में उन मंझोले और छोटे कद के जानवरों का बसेरा और भोजन की भी समस्या थी.... शेर के सामने तमाम जानवरों ने सुझाव भी रखा कि इन झाड़ियों का फायदा ही अधिक है जबकि नुकसान बेहद कम.. लिहाजा आग लगाना उचित न होगा क्योंकि जंगल में तमाम सूखे दरख्त भी थे ऐसे में आग लग जाने के बाद अगर उसने रौद्र रूप धारण कर लिया तो उसके बुझाने के कोई प्लान न था..... मगर चूंकि शेर बूढ़ा हो रहा था दृष्टि के साथ शारीरिक परेशानियों ने भी उसे घेरना शुरू कर दिया था ऐसे में ख्वाहिश तो उसकी यही थी कि जब जंगल में झाड़ियां ही न बचेंगी तो शिकार दूर तक दिखेगा और झाड़ियों में घुसकर नजरों से ओझल भी न हो सकेगा मगर प्रत्यक्ष में वह दूसरे लहूलूहान हो चुके जानवरों का उदाहरण देकर माहौल बनाए था। हाथी, हिरन, खरगोश, लोमड़ी, जंगली सुअर, भैंस जैसे जानवर इसके पक्ष में न थे मगर परिन्दों ने एकमत से शेर का समर्थन किया...... और इस तरह ये हुक्म तामील हो गया कि कल सुबह राजकीय सियार जंगल में आग लगाएंगे।
अगले दिन सियार ने राजा का हुक्म का पालन करने के लिए भरे मन से कुछ सूखे पत्ते बटोरकर आग लगा दी हालांकि आग लगाते समय उसे एकबार अपने परिवार की याद जरूर आयी जो इसी जंगल की एक मांद में रहते थे मगर उसके पास आप्शन क्या था?
देखते ही देखते आग बढ़ने लगी... दो चार बंदर चपेट में आए तो परिंदे बेहद खुश हुए कि इन कम्बख्तों ने उनके बहुत से घोंसले उजाड़े हैं... धीरे-धीरे आग बढ़ रही थी हाथी, सियार, लोमड़ी, खरगोश, गिलहरी भाग रहे थे मगर आग की रफ्तार उनकी रफ्तार से बहुत तेज थी। अधिकतर जानवरों ने परिंदों का कुछ न कुछ नुकसान किया था लिहाजा परिंदे पुरसुकून होकर दरख्तों की चोटी पर बैठे ये नजारा देखकर खुश हो रहे थे।आग कौन सा पेड़ों तक पहुंची है जो उन्हें कोई डर हो और अगर पहुंचेगी भी तो वह जब चाहेंगे तब उड़ जाएंगे।
धीरे-धीरे लपटें बढ़ने लगी सूखे दरख़्तों ने जब आग पकड़ी तो आसमान से बातें करने लगी अब तो हरे पेड़ भी उसकी चपेट में आ चुके थे परिंदों का गर्मी, सबकुछ भस्म करने पर आमादा लपटें और धुएं से बुरा हाल था। अब दरख्तों पर बैठ पाना भी संभव न था उन्होंने अपने डैने फड़फड़ाये और लम्बी उड़ान भरी मगर यह क्या सारे जंगल में आग फैल चुकी थी लपटें आसमान तक पहुंच रही थीं। परिंदे बड़ी देर तक उड़ते रहे जहाँ वह उतरकर खुद को सुरक्षित महसूस कर सकें... उनके डैने अब बेहद थक चुके थे। आखिर कब तक उड़ान भरते रहते अंततः उन्हें कहीं टिकने के लिए जमीन पर तो आना ही था। बदन शिथिल हो चुका था.... डैने बेइंतहा दर्द की वजह से चलाये ही न जा रहे थे उनकी उड़ान थम गयी। उनका जिस्म जमीन पर आने लगा... मगर जमीन पर आने से पहले ही ऊंची-ऊंची आग की लपटों ने उन्हें भी अपनी जद में ले लिया।