हम भी इक धूप के फूल हैं
दिन ढलेगा, बिखर जायेंगे
एक डोली पे सज-सज के हम
अर्थियों पर उतर जायेंगे।
यह मेरुदंड है न!
जिस पर हम खड़े हैं
वह टूट गया है..
हमसे रूठ गया है
न ही शब्द थे न ही जिस्म थे
एहसास थे बस भाव थे
कभी पेड़ की एक छाँव में
रूककर जरा सुस्ता लिए
एक बंदरगाह पर
ता-उम्र लंगर डाल।
ज़िंदगी के पोत ने
यूँ ही बिताए साल।।
कितने गीत अनसुने गाये।
कितने मीत अनकहे पाये ।
कितनी आशाएं टूटी और
कितने सपने हुए पराये।
मस्त कबीरा कैसे गाये ।
याद आ रहा आज वो पहला सफर
जब स्कूटर के पीछे बैठ कर
कर रही थी नाखून से कलाकारी
और थी उम्मीद कि समझ पाऊँ
उन हिज्जे को कि शब्द क्या बोल रहे !
मेरा ख़याल जो तेरा ख़याल हो जाये
तो खत्म तेरा मेरा हर सवाल हो जाये
मिलें हो काश हमारे तुम्हारे दिल ऐसे
सितम हो तुझ पे मेरी आँख लाल हो जाये
हाथ पसारे, सड़क किनारे
फिरते हैं ये फूल
इन्हें जग करता नहीं क़ुबूल
आकाश के बीचो-बीच
चांद का उतरता हुआ रंग
रक्तिम आभा से
परिणत हो जाता है
गहरे स्याह रंग में.
जुबानी तीर चल गए
जख्म अभी रिसते हैं
बदले उम्र के कैलेंडर
हम बस दिन गिनते हैं
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