प्रख्यात एवं वरिष्ठ लेखिका "डॉ पुष्पलता" का काव्य 'पानी की देह' मुझे पीडीएफ़ के द्वारा मिली, डॉ पुष्पलता एक उच्चकोटि की लेखिका है। आपकी अनेक पुस्तकें मन का चांद, अरे बाबुल काहे को मारे, खंडकाव्य एक और अहल्या, एक और वैदेही, एक और उर्मिला आदि जिनके लिए अनेक पुरस्कार पा चुकी हैं।
सूरज पर स्याही, झांझर मीरा की, नदी कहती है आदि पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। एवं बहुत से पुरस्कारों से सम्मानित है जिनमें महादेवी वर्मा प्रमुख हैं| जब आपकी पुस्तक 'पानी की देह' मुझे मिली थोड़ी अचरज हुई इसका शीर्षक पढ़कर चूंकि यह मेरी पहला अनुभव था किसी पुस्तक को पढ़ने का तो मेरी उत्सुकता भी बहुत थी। फिलहाल आगे मेरे साथ कुछ और अजूबे होते हैं जब पुस्तक पढ़ना शुरू किया दो और तीन पेज पढ़ने के बाद समझ में आता है। यह एक लंबी कविता है जिसके एक सिरे दूसरे सिरे से जुड़े हैं और कविता जुड़ती हुई एक लम्बी चैन बना लेती है जो लेखिका के जीवन की गूढ़ सोच, बुद्धिमत्ता, दर्द-पीड़ा मीमांसा का परिचय कराती है और पाठक को अलौकिक जगत में ले जाती है| जहां पाठक और कविता के मध्य एक रिश्ता सा बनता चला जाता हैं और अंत तक पाठक को अपने सिरों से जोड़े रखता है।
पानी की देह/ पिता के रक्त/ माँ की देह से बना हूँ/ कठपुतली हूँ मैं / जिसके सिरे अपनों के हाथ में है/ माँ पिता, दादा, दादी / जाने कितनी देह /चेहरों को मिलाकर /मेरी देह बनी है /जब चाहें नचाते रहें / उंगलियों पे/ चांद, पेड़ा, लड्डु, पति/ बनकर/ लेखिका की पहली पंक्तियों में ही अनुभूतियों की पराकाष्ठा देखने को मिलती हैं और यथार्थ भी यही है हमारे समाज की स्त्री जो सारी उम्र पिता, पति और बेटे की दी ढील के हिसाब से अपनी जिन्दगी बसर करती आ रही है और शायद आगे भी इसी परम्परा को निभाती रहेगी।
अगर वह एसा नहीं करती तो वह अन्य सिरों से खारिज कर दी जाएगी और वह अवसाद में चली जाएगी जोकि इन पंक्तियों से लेखिका की दूरदर्शिता का पता चलता है / तोड़ नहीं सकता सिरे / इन्हीं सिरों मे है/ मेरा वजूद / वरना पहुच जाऊंगा /मरणासन्न होकर / अवसाद के अंधेरे बक्से में / जहां पहले से मौजूद हैं/ ढेर सारी अजनबी कठपुतलियाँ /यही वो विवशता, कशमकश, तिलमिलाहट, है जिससे लेखिका कविता के अन्य दूसरे आयामों से जोड़े रहती है|
पानी की देह अवसाद के अंधेरे बक्से से निकलकर मुक्ति के उपाय ढूँढने के अनेकानेक प्रयासों, प्रार्थनाओं अपेक्षाओं, सवेदनाएं एवं पुनर्नवा को भी स्वीकार करती है। जैसा कि इन पंक्तियों में लेखिका ने बखूबी उभारा है।
नाचते हुए भी ढूंढ रहा हूँ/ मुक्ति के उपाय जहां न मेरे लिए/ सिरे हों न कठपुतलियाँ/ न मैं / किसी के लिए सिरा बनूँ / न कठपुतली / तुम्हारी देह खो बैठी है / गुड़ देने की काबलियत / मेरी देह के साथ भी यही होगा दिखावा / इन पंक्तियों में लेखिका ने मानव देह के यथार्थ को बताया है जो सत्य भी है| इसके अतिरिक्त "पानी की देह" में देह का प्राण होना, पुनर्नवा को स्वीकार करना , देह का नदी होना, समुद्र से जुड़ती हुई समुद्र के खारे जल को वाष्प में परिवर्तित कर वापस कर मीठा जल के रूप में वापस करना पुनर्नवा ही तो है। कविता पाठकों की रुचि को बनाएं रखती हैं।
जब देह बाढ़ का स्वरूप धारण करती है तो किस प्रकार विनाशकारी होती है लेखिका की इन पंक्तियों में देख सकते हैं देह उमड़ती भी है / नदी की तरह लील जाती है / आसपास का सबकुछ / देह का माली होना __ मैं उस माली की तरह हूँ/, जो सींचता है उपवन/ मगर बड़े होते ही काट देता है पेड़ों के सिर/ अपनों से बड़ा पेड़ पसंद नहीं मुझे/ तब तो बिल्कुल भी नहीं / जब वह पेड़/ तुम्हारे भीतर उगे/ । सच में लेखिका की परम अनुभूति का एहसास कराती हैं औैर उस अलौकिक जीवन के दर्शन कराती हैं जहां हर सिरा दूसरे सिरे से जुड़ा है। जिसमें स्त्री पुरुष के जीवन के उतार चढाव जिसमें स्त्री कितनी भी क्यों न विवश हो पर जूठन उसे स्वीकार नहीं हैं जैसी विसंगतियों को बहुत बारीकियों से दर्शाया है और अपनी रचनाधर्मिता से परिचय कराया हैं।
देहो में / स्त्री देह /होती है भिन्न/ पुरुष से इस देह में अधिक / होता है मान /भूख के बावजूद/ वह पसंद नहीं करती/ जूठन यद्यपि बिकती भी है/ विवशता में/ यदा-कदा /मगर बेचती नहीं है/ अपनी रूह/ इसी तरह अनेकों बिम्ब हैं को बताया है इसके अतिरिक्त "पानी की देह" में देह का प्राण होना, पुनर्नवा को स्वीकार करना, देह का नदी होना, समुद्र से जुड़ती हुई समुद्र के खारे जल को वाष्प में परिवर्तित कर वापस कर मीठा जल के रूप में वापस करना पुनर्नवा ही तो है। "पानी की देह" सूरज, चांद, पोते पोतियों के रूप में अभिमन्यु की तरह चक्रव्यूह में पति द्वारा बहनों का बलात्कार की असीम पीड़ा का दर्द, देह का अनपढ़ होना, देहों का चिड़ियां, चांद की देह में करोड़ों सवालों के साथ सिरों से जुडी़ रहती है।
कविता पाठकों की रुचि को बनाएं रखती हैं जहां पर लेखिका की लेखनी ,पाठकों को सोचने पर विवश करती है और उत्सुकता बनाए रखती है कि "पानी की देह" आगे किन स्रोतों से गुजरेगी और देह का अंतिम लक्ष्य और उद्देश्य क्या है जानने के लिए और अपनी जिज्ञासा को शांत करने के लिए पाठक को "पानी की देह" पढ़ना होगा जानना होगा कि "पानी की देह" इंसान के जीवन चक्र, उतार चढाव से किस प्रकार जुडी़ है। कविता लयबद्ध है जिस तरह सुर से ताल जुड़ा होता है। पानी की देह भी इसी तरह अपनों के एक दूसरे के सिरों से जुडी़ हुई है। यह अपनी लयता से हटती नहीं है।