पीड़ा व्यापित है दिग-दिगन्त, सुख थोड़ा है पर दुख अनन्त ;
पतझड़ बगिया में डोल रहा, कैसा वसन्त ? किसका वसन्त ??
जूही-चम्पा की लुटी लाज,
अपमानित उपवन के गुलाब ;
गंगाजल बहता नाली में,
है भरी स्वर्ण-घट में शराब ;
गायों के थन सूखे-निचुड़े, विषधर के पैने हुये दन्त ;
पतझड़ बगिया में डोल रहा, कैसा वसन्त ? किसका वसन्त ??
नि:शब्द दिशा,स्तब्ध क्षितिज,
बन्दी दिनकर तम के घर पर ;
तितलियाँ-भ्रमर हैं निर्वासित,
निष्प्राण भोर,कलुषित दुपहर ;
देहरी सूनी, आँगन नीरव ; विरही दुल्हन, परदेस कन्त,
पतझड़ बगिया में डोल रहा, कैसा वसन्त ? किसका वसन्त ??
मुरझाये केसर के पादप,
सरसों के पुष्प रक्तरंजित ;
निर्जन-उजाड़ हैं आम्र-कुंज,
थूहर-बबूल महिमामंडित ;
दुर्जन करते हैं अट्टहास, सज्जन आक्षेपित हाय हन्त !
पतझड़ बगिया में डोल रहा, कैसा वसन्त ? किसका वसन्त ??
अंधे बन गये मार्गदर्शक,
गीतों के निर्णायक बहरे ;
गिद्धों-चीलों का अभिनंदन,
कोयल की तानों पर पहरे ;
मैना बंदी, कौआ स्वतंत्र ; खल-शठ प्रसन्न, रो रहे सन्त ;
पतझड़ बगिया में डोल रहा, कैसा वसन्त ? किसका वसन्त ??
चौपालों पर है सन्नाटा,
मधुशालाओं में कोलाहल ;
नदिया दूषित, पनघट उदास,
हिमनद से निःसृत हुआ गरल ;
दानवता का तांडव नर्तन, मानवता का हो गया अन्त ;
पतझड़ बगिया में डोल रहा, कैसा वसन्त ? किसका वसन्त ??