आज भौतिकवाद की चकाचौंध हर जगह दिखाई दे रही है। हर व्यक्ति जीवन की भागमभाग में शामिल है। विज्ञान के नित नए होने वाले अविष्कार ने सबको अस्त-व्यस्त कर दिया है।
नित नए-नए प्रयोगों से नवीनता की खोज की जा रही है। जीवन जीने के मायने लगातार बदल रहे हैं। आज का वातावरण एक प्रतियोगिता जैसा हो रहा है। हर व्यक्ति अपने को प्रतिभागी समझता हुआ भौतिकता को ही सर्वस्व समझ रहा है। मनुष्य जितना अधिक भौतिकता में उलझा, संस्कारों का संक्रमण उतनी ही तेज गति से होता गया। व्यक्ति की सम्पूर्ण मानसिक और शारीरिक क्षमता भौतिकता की चाह में व्यय हो रही है। भावनात्मक पक्ष नगण्य होता जा रहा है एवं सामाजिक जीवन भी नितांत परिवर्तित हो गया है।
हमारा देश को प्राचीन समय में 'सोने की चिड़िया' कहा जाता था। यह धरती आर्थिक रूप से तो समृद्ध थी ही वहीं ज्ञान-सम्पदा भी अपार एवं श्रेष्ठतम थी। भारतीय भूमि के सिद्ध-पुरुष भगवान महावीर हों या गौतम बुद्ध, भगवान श्री कृष्ण हों या श्री राम उनकी बातें आज भी प्रासंगिक एवं प्रेरणादायी हैं। गणित, जीव-विज्ञान, शरीर शास्त्र, चिकित्सा, खगोल विज्ञान, भवन एवं शहर निर्माण, पारिवारिक व्यवस्था, धर्म एवं दर्शन इत्यादि अनेक क्षेत्रों में हमारे ज्ञान का भण्डार समग्र विश्व का प्रदर्शन कर रहा है, परन्तु आज हम भारतीय अपने गौरव को ही विस्मृत करते जा रहे हैं।
हर व्यक्ति सफलता के शिखर पर पहुँचना चाहता है, लेकिन सफलता में आवश्यक शास्त्रोक्त मौलिक सूत्रों को नजरअंदाज कर रहा है। इसी कारण व्यक्ति के जीवन से आज उत्साह गायब हो गया है, समाप्त हो रहा है। भागम-भाग की जिंदगी में व्यक्ति मशीन बनकर रह गया है। भौतिक तत्वों के बढ़ने से मनुष्य की ऊर्जा का परिवर्तन उसे शक्तिशाली होने का गर्व तो महसूस करा सकता है, लेकिन उसे जीवन का आनन्द नहीं दे सकता है। दिन-प्रतिदिन चीजों के विशालकाय होने से मनुष्य आतंकित हो रहा है। जिससे रिश्तों और जीवन के बीच का फासला बढ़ता जा रहा है। विकासवाद के एक प्रसिद्ध वैज्ञानिक चार्ल्स डार्विन के अनुसार-- 'वही प्राणी जीवन में सफल हो सकता है जो हर परिस्थिति का सामना करने में सक्षम हो। अर्थात व्यक्ति को आत्म-विश्वास से हर परिस्थिति का मुकाबला करना चाहिए।
हर संघर्ष एक नई विचारधारा को जन्म देता है, जिससे विकास की नई संभावनाओं को बल मिलता है।
व्यक्ति का व्यक्तित्व उसकी बड़ी पहचान है। इसकी अपनी उपयोगिता है तथा सफलता में सहायक सिद्ध होती है। विनम्रता, सादगी और सहिष्णुता आदि गुण होने से मार्ग प्रशस्त हो जाता है।जीवन के हर पड़ाव पर संभावनाएं मौजूद रहती हैं। सदा आशावादी दृष्टिकोण अपनाने से जीवन में उमंग बनी रहती है। एक असफलता से व्यक्ति को निराश नहीं होना चाहिए, बल्कि उससे एक सीख लेकर नई संभावनाओं की खोज करनी चाहिए। हर सफल व्यक्ति के पीछे कोई आदर्श और सद्प्रेरणा ऊर्जा के रूप में कार्य करती है। जीवन की समग्रता, समरसता एवं सरसता में ही सफलता निहित है। सकारात्मक सोच के साथ भारतीय शास्त्रों की ज्ञान-संपदा को जीवन में आत्मसात कर लेने से जीवन में सफलता का मार्ग स्वयं प्रशस्त हो जायेगा।
ज्ञानी पुरुषों का यह अभिमत है कि सफलता प्राप्त करने की शक्ति तो प्रायः सभी में होती है परन्तु कुछ लोग ही इसका उपयोग करना जानते हैं और कुछ नहीं भी जानते हैं। कुछ व्यक्ति ऐसे भी होते हैं जिन्हें यह अहसास तक भी नहीं होता है कि मैं भी सफलता के शिखर छू सकता हूँ। हम अपने ही इर्द-गिर्द ऐसे व्यक्तियों को देख सकते हैं, जिनमें से कुछेक ने सफलता प्राप्त की हैं। यदि अब तक भी सफलता हमसे दूर हैं तो इसका कारण केवल इतना ही है कि हमने अपनी शक्ति और उसकी अभिव्यक्ति के सही तरीकों को पहचाना नहीं है। सफलता के को यदि सही ढंग से जान लें और उसका सही उपयोग करने लगें तो सफलता बहुत शीघ्र हमारे हाथों में होगी।मन के जीते जीत है ,मन के हारे हार।