नई दिल्ली। दिल्ली हाईकोर्ट ने दिल्ली ट्रांसपोर्ट कॉर्पोरेशन (डीटीसी) के एक पूर्व कंडक्टर राम धारी सिंह के मामले में लेबर कोर्ट के फैसले को पलट दिया है। अदालत ने कहा कि अनधिकृत अनुपस्थिति के दोषी कर्मचारी की सेवा से हटाने की सजा को केवल सेवा की लंबाई के आधार पर संशोधित नहीं किया जा सकता।
न्यायमूर्ति शैल जैन की पीठ ने डीटीसी की याचिका को मंजूर करते हुए सिंह की सेवा से हटाने के 2003 के आदेश को बहाल कर दिया।
राम धारी सिंह को 1985 में डीटीसी में कंडक्टर के रूप में नियुक्त किया गया था। अप्रैल 2001 से जुलाई 2001 तक अनधिकृत रूप से अनुपस्थित रहने के कारण उन्हें चार्जशीट जारी की गई। विभागीय जांच में आरोप सिद्ध होने के बाद 29 अगस्त 2003 को उन्हें सेवा से हटा दिया गया। सिंह ने इस आदेश के खिलाफ औद्योगिक विवाद उठाया, जिसे लेबर कोर्ट में भेजा गया। लेबर कोर्ट ने 8 जुलाई 2016 के अपने फैसले में जांच को वैध माना और अनुपस्थिति के आरोप को सिद्ध पाया, लेकिन सिंह की 18 वर्ष की सेवा को ध्यान में रखते हुए सजा को संशोधित कर उन्हें 2003 से सेवानिवृत्त मान लिया और पेंशन समेत अन्य लाभ देने का आदेश दिया। डीटीसी ने इस फैसले को दिल्ली हाई कोर्ट में चुनौती दी।
हाई कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि इंडस्ट्रियल डिस्प्यूट एक्ट, 1947 की धारा 11-ए के तहत लेबर कोर्ट सजा में हस्तक्षेप तभी कर सकता है जब वह कानूनी रूप से प्रासंगिक कम करने वाला कारक हो। अदालत ने नोट किया कि सिंह का सेवा रिकॉर्ड खराब था, जिसमें अनुपस्थिति के कई मामले थे और पहले भी सेंसर, इंक्रीमेंट रोकने और वेतनमान में कमी जैसी सजाएं दी गई थीं। कोर्ट ने कहा कि बार-बार की अनुपस्थिति डीटीसी जैसी सार्वजनिक परिवहन सेवा में सार्वजनिक हित को प्रभावित करती है।


