आये फिर लहरों में तिरने के दिन
घोल रही मधुगन्धा मदमाते घोल
इच्छाएँ घूम रहीं बाँध-बाँध टोल
पल्लव से अंतर के चिरने के दिन
छींट दिए मौसम ने सम्मोहन -बीज
सौरभ ने सरसों की पायल पर रीझ
स्वीकारे आवारा फिरने के दिन
खोली है आमों ने बौरायी हाट
उतरे हैं सुधि-पाखी प्राणों के घाट
हिरनी के सपनों में हिरने के दिन
छोड़ दिये चाहों ने वर्जन के घर
गूँज रहे कानों में वंशी के स्वर
कोमल भुजपाशों में घिरने के दिन
चलो चलें कहते हैं बौराये पाँव
फूलों की घाटी में सपनों के गाँव
नहीं आज रुकने के थिरने के दिन
आये फिर लहरों में तिरने के दिन