“इस समय तक” चर्चित वरिष्ठ कवि-साहित्यकार श्री धर्मपाल महेन्द्र जैन का प्रथम कविता संग्रह हैं. इसके पूर्व इनका एक व्यंग्य संग्रह "सर क्यों दाँत फाड़ रहा है?" प्रकाशित हो चुका है. लेखक की रचनाओं की विशेषता है कि बरसों से वे विदेश में रहकर भी अपनी हर साँस में भारत को जीते हैं. धर्मपालजी की कविताओं का फलक व्यापक है. इस कविता संग्रह में एक ओर प्रकृति सौंदर्य और मानवीय संबंधों की मधुरता है तो दूसरी ओर वे प्रजातंत्र की दुर्दशा और मनुष्यता के क्षय और विध्वंस के प्रति चिंतित दिखते हैं. इस संग्रह की कविताओं में कवि की और साथ में हमारी भी अनुभूतियों की प्रतिध्वनियाँ गूँजती हैं. यह एक ऐसा कविता संग्रह है जो कई मुद्दों और विषयों पर प्रकाश डालता हैं. श्री धर्मपाल महेन्द्र जैन ने अपने कविता संग्रह “इस समय तक” में अपने जीवन के कई अनुभवों को समेटने की कोशिश की है. इस संग्रह में परिवार, रिश्ते, प्रकृति, प्रेम, गाँव और ग्रामीण जीवन की स्थितियों को अभिव्यक्त करती कविताएँ हैं. यह समकालीन कविताओं का एक सशक्त दस्तावेज़ है. इस संग्रह की हर रचना पाठकों और साहित्यकारों को प्रभावित करती है. इस संकलन में 78 छोटी-बड़ी कविताएँ संकलित हैं. प्रकाशन के पहले संस्करण वर्ष (2019) में ही इसके दूसरे संस्करण छपने एवं शांति-गया स्मृति कविता पुरस्कार के लिए चुने जाने की ख़बर से यह किताब चर्चा में रही.
इस कविता संग्रह की पहली कविता “सुबह” ही इतनी प्रभावशाली है कि पाठक अपनी उत्सुकता रोक नहीं पाता है. “सुबह”, “प्रार्थना”, “माँ मैंने देखा”, “इस बार” इत्यादि भावपूर्ण कविताएँ माँ की अहमियत पर प्रकाश डालती हैं. “बेटी के जन्म पर”, “दो साल की वह”, “वह चाहती है”, “बड़ी होती बेटी” इत्यादि कविताएँ बेटी के प्रति एक पिता के लगाव को महसूस कराती हैं. प्रेम एवं रिश्तों में जीवंतता को अभिव्यक्त करती ये कविताएँ पाठकों को प्रेम, रिश्ते और मानवीय संवेदनाओं से अभिभूत कर देती हैं. “साहबान!” एवं “परेशान है चिड़िया” को उनके इस काव्य संग्रह की सबसे सशक्त कविताएँ कहा जाए तो अतिशयोक्ति नहीं होगी. “साहबान!” कविता की पंक्तियाँ “रातों-रात कहीं भाग गया है गाँव मेरा. साहबान! आपने कहीं देखा है गाँव मेरा” नामक कविता पाठकों को अंदर तक झकझोर देती हैं. “परेशान है चिड़िया” कविता की पंक्तियाँ “बस्ती नहीं रही उसके लायक, न वह सीख पाई कंक्रीट में घोंसले बनाना, उसे चाहिए पेड़ बड़ा-सा, जो छुपा सके उसका बसेरा, छोड़ दी उसने बस्ती आदमी के लिए” महानगरों में आजकल चारों ओर सीमेंट के जंगल ही जंगल दिखाई देते हैं. कवि ने इन कविताओं के माध्यम से आदमी के गिरते रूप को अभिव्यक्त किया है.
“भोपाल: गैस त्रासदी” कविता में व्यवस्था पर गहरा कटाक्ष है. इस कविता में कवि कहते हैं “ बीता हिंस्त्र शिशिर, बहुत हुए शोक के बारह दिन, वसंत आया, गया, झुलसने लगी धूप, पिघलने लगा सूरज, वे खस से छन कर आती हवा में, पीने लगे बहुराष्ट्रीय कंपनियों की बोतलें, गाने लगे हवा में गीत की गंध है, शवों की लौ पर, वे सेंकने लगे शब्दों की रोटियाँ” इस कविता में धर्मपाल जी की बैचेनी और व्यथा महसूस की जा सकती हैं. संग्रह की कुछ कविताओं “उस समय से” एवं “संविधान” में व्यंग्य भी है क्योंकि कवि एक व्यंग्यकार भी हैं.
“अ - अधिकार का” और “रोना यातना नहीं हैं” इस संग्रह की ऐसी विशिष्ट रचनाएँ हैं जो पाठकों को मानवीय संवेदनाओं के विविध रंगों से रूबरू करवाती हैं. कविताओं में कवि के मन के भीतर चल रही उठा-पटक महसूस की जा सकती है. लेखक की रचनाओं में शोषित, असहाय व्यक्तियों के प्रति उनकी पक्षधरता उन्हें एक प्रगतिशील और जनवादी कवि की पहचान दिलाती है. धर्मपालजी की लेखनी का कमाल है कि उनकी रचनाओं में सहजता, आत्मिक संवेदनशीलता, जीवन का स्पंदन, भावों की तीव्रता प्रतिबिंबित होती हैं. इस संग्रह की कविताएँ हमें ठहरकर सोचने को मजबूर करती है. कवि की रचनाओं में आदि से अंत तक आत्मिक संवेदनशीलता व्याप्त है. कवि की रचनाओं में जीवन के तमाम रंग छलकते नज़र आते हैं. 160 पृष्ठ की यह किताब आपको कई विषयों पर सोचने के लिए मजबूर कर देती है. यह सिर्फ़ पठनीय ही नहीं है, संग्रहणीय भी है. यह काव्य संग्रह भारतीय कविता के परिदृश्य में अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज करवाने में सफल हुआ है.