वर्तमान भारत में सक्रिय करनी सेना, बजरंग दल, हिंदू सेना और महावीर सेना जैसे संगठन एक तरह से पारंपरिक अखाड़ों का ही आधुनिक और राजनीतिक रूप हैं।
हालांकि ये संगठन खुद को सनातन धर्म और संस्कृति का रक्षक बताते हैं, लेकिन पुराने ज़माने के पारंपरिक अखाड़ों और आज के इन संगठनों (जिन्हें अक्सर 'धार्मिक सेनाएं' कहा जाता है) के बीच काम करने के तरीके, मक़सद और प्रभाव में कुछ बहुत बड़े अंतर और समानताएं हैं।
पारंपरिक अखाड़ों से समानताएं
• धर्म और संस्कृति की रक्षा का दावा: जिस तरह प्राचीन काल में अखाड़ों (जैसे जूना अखाड़ा, निरंजनी अखाड़ा) का गठन विदेशी आक्रमणकारियों से मंदिरों और सनातन धर्म की रक्षा के लिए 'नागा साधुओं' की सैन्य टुकड़ियों के रूप में किया गया था, ये आधुनिक संगठन भी खुद को धर्म का रक्षक बताते हैं।
• शारीरिक शक्ति और शस्त्र प्रदर्शन: पारंपरिक अखाड़ों में मल्लियुद्ध, लाठी-काठी और तलवारबाजी सिखाई जाती थी। आज के संगठन भी शौर्य प्रदर्शन, त्रिशूल दीक्षा या आत्मरक्षा के नाम पर युवाओं को शारीरिक रूप से संगठित करते हैं।
आधुनिक संगठनों में आए बड़े बदलाव
जहां पारंपरिक अखाड़े आध्यात्मिक नियमों, संन्यास और कड़े अनुशासन से बंधे होते हैं, वहीं आज की 'धार्मिक सेनाएं' इनसे काफी अलग हैं:
• राजनीतिक झुकाव और लामबंदी: पारंपरिक अखाड़े मुख्य रूप से धार्मिक और आध्यात्मिक हुआ करते थे। इसके विपरीत, आधुनिक सेनाएं और दल सीधे या परोक्ष रूप से राजनीति और चुनाव को प्रभावित करते हैं। इनका इस्तेमाल वोट बैंक की लामबंदी के लिए किया जाता है।
• सोशल मीडिया और आधुनिक तकनीक: ये संगठन अब केवल अखाड़ों तक सीमित नहीं हैं। ये सोशल मीडिया, वॉट्सऐप और डिजिटल प्लेटफॉर्म्स के जरिए बहुत तेजी से युवाओं को जोड़ते हैं और भीड़ इकट्ठा (Mobiliation) करते हैं।
• पहचान और जातिवादी राजनीति: पारंपरिक अखाड़े सन्यासी परंपरा पर चलते थे जहां जाति मायने नहीं रखती थी। लेकिन आज की कुछ सेनाएं (जैसे करनी सेना) किसी खास जाति या समुदाय के गौरव को लेकर ज्यादा मुखर हैं, न कि केवल व्यापक धार्मिक पहचान को लेकर।
• अक्सर विवादों और कानून-व्यवस्था से टकराव: इन आधुनिक संगठनों पर अक्सर मोब लिंचिंग, विरोध प्रदर्शनों के दौरान हिंसा, फिल्मों पर बैन लगाने की मांग और कानून को अपने हाथ में लेने के आरोप लगते रहते हैं, जो पारंपरिक अखाड़ों की मूल मर्यादा से अलग है।
निष्कर्ष के तौर पर, हम कह सकते हैं कि इन संगठनों ने पारंपरिक अखाड़ों के 'लड़ाकू या रक्षक' वाले विचार को तो अपनाया है, लेकिन इसका ढांचा पूरी तरह आधुनिक, राजनीतिक और सामाजिक दबाव समूह जैसा हो गया है।


