चंद्रशेखर का प्रधानमंत्रित्व काल लंबा नहीं था। लेकिन किसी नेता की राजनीतिक विरासत केवल उसके कार्यकाल की लंबाई से तय नहीं होती। कई बार किसी छोटे कार्यकाल में उठाया गया कोई प्रश्न आने वाले दशकों की सार्वजनिक नीति को प्रभावित करता है।
भारत के पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर का जन्म शताब्दी वर्ष केवल एक राजनीतिक व्यक्तित्व को याद करने का अवसर नहीं है। यह उस राजनीतिक और सामाजिक चेतना को फिर से सामने लाने का अवसर भी है, जिसमें सत्ता से अधिक महत्व मनुष्य की गरिमा का था। चंद्रशेखर के लिए लोकतंत्र तभी सार्थक था, जब समाज के सबसे वंचित व्यक्ति को भी सम्मान के साथ जीने का अधिकार मिले।
मैला ढोने की प्रथा के खिलाफ उनकी पहल इसी दृष्टि का एक महत्वपूर्ण उदाहरण है। यह केवल स्वच्छता का प्रश्न नहीं था, बल्कि जातिगत असमानता, सामाजिक बहिष्कार, गरीबी और मानव गरिमा से जुड़ा हुआ सवाल था। प्रधानमंत्री के रूप में चंद्रशेखर ने इस समस्या को जिस राजनीतिक गंभीरता के साथ देखा, वह उनके समाजवादी और मानवीय दृष्टिकोण को समझने की महत्वपूर्ण कड़ी है।
बीसवीं सदी के उत्तरार्ध तक भारत के अनेक शहरों, कस्बों और गांवों में सूखे शौचालयों का इस्तेमाल होता था। इन शौचालयों से मानव मल को हाथ से निकालकर ढोने की व्यवस्था लंबे समय तक बनी रही। यह व्यवस्था स्वास्थ्य और पर्यावरण के लिए गंभीर समस्या थी, लेकिन उससे भी अधिक गंभीर उसका सामाजिक पक्ष था।मैला ढोने का काम ऐतिहासिक रूप से मुख्यतः दलित और देशज पसमांदा की कुछ जातियों पर थोपा गया। यह केवल एक पेशा नहीं था, बल्कि जातिगत भेदभाव और सामाजिक बहिष्कार की उस व्यवस्था का हिस्सा था, जिसने अनेक परिवारों को पीढ़ियों तक अपमानजनक परिस्थितियों में जीवन बिताने के लिए मजबूर किया।
इसी संघर्ष को व्यावहारिक दिशा देने में समाज सुधारक डॉ. बिंदेश्वर पाठक की भूमिका ऐतिहासिक रही। सुलभ इंटरनेशनल के संस्थापक पाठक 1960 के दशक के उत्तरार्ध में बिहार गांधी जन्म शताब्दी समारोह से जुड़े भंगी मुक्ति कार्यक्रम के माध्यम से इस समस्या के करीब आए। उन्होंने सफाई कर्मचारियों की सामाजिक स्थिति और उनकी पीड़ा को प्रत्यक्ष रूप से समझा।
इसके बाद उन्होंने मैला ढोने की प्रथा के विकल्प के रूप में कम लागत वाली दो-गड्ढों वाली जल-सीलित पोर-फ्लश शौचालय तकनीक को बढ़ावा दिया। 1970 में सुलभ आंदोलन की संस्थागत शुरुआत हुई। इसका उद्देश्य केवल शौचालय बनाना नहीं था, बल्कि ऐसी तकनीक उपलब्ध कराना था जिससे मानव मल को हाथ से उठाने की आवश्यकता समाप्त हो और सफाई कर्मचारियों को इस अमानवीय पेशे से मुक्ति मिल सके।
यहीं से स्वच्छता का सवाल सामाजिक सम्मान और पुनर्वास के सवाल से जुड़ता गया।
इस अभियान को राजनीतिक स्तर पर महत्वपूर्ण दिशा तब मिली, जब 25 नवंबर 1990 को नई दिल्ली में तत्कालीन प्रधानमंत्री चंद्रशेखर ने डॉ. बिंदेश्वर पाठक से मुलाकात की।इस मुलाकात के केंद्र में देश में सूखे शौचालयों और सिर पर मानव मल ढोने की प्रथा का प्रश्न था। उस समय उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार देश के लगभग 3,245 कस्बों, शहरों और गांवों में करीब 60 लाख सूखे शौचालय मौजूद थे और लगभग छह लाख सफाई कर्मचारी इस अमानवीय व्यवस्था से जुड़े हुए थे।
चंद्रशेखर ने इस समस्या को महज सरकारी फाइल या स्थानीय निकायों की जिम्मेदारी के रूप में नहीं देखा। उनके लिए यह मानव गरिमा का प्रश्न था। उस समय प्रकाशित रिपोर्टों में उनके हवाले से कहा गया कि सिर पर मानव मल ढोना समाज पर एक कलंक है और इसे समाप्त करना ही होगा। यह दृष्टिकोण महत्वपूर्ण था। क्योंकि सवाल केवल यह नहीं था कि सूखे शौचालयों को पोर-फ्लश शौचालयों में कैसे बदला जाए। असली सवाल यह भी था कि जिन लोगों की आजीविका इस अमानवीय व्यवस्था से जुड़ी हुई थी, उन्हें इससे बाहर निकालकर सम्मानजनक जीवन और वैकल्पिक रोजगार कैसे दिया जाए।
चंद्रशेखर और डॉ. पाठक के बीच हुई चर्चा में स्वच्छता को व्यापक सामाजिक परिवर्तन से जोड़ने की कोशिश दिखाई देती है। धार्मिक स्थलों और सार्वजनिक सभा स्थलों पर सुलभ शौचालय परिसरों के निर्माण, ग्रामीण क्षेत्रों में स्वच्छता सुविधाओं के विस्तार और महिलाओं को खुले में शौच की असुरक्षा तथा अपमान से बचाने जैसे विषयों पर भी विचार हुआ।
चंद्रशेखर ने गांवों में प्रशिक्षित ‘परिवर्तन-दूतों’ की अवधारणा में भी रुचि दिखाई। डॉ. बिंदेश्वर पाठक का प्रस्ताव था कि ऐसे प्रशिक्षित ग्रामीण कार्यकर्ता प्राथमिक स्वास्थ्य, पंपसेट की मरम्मत, सड़क, भवन और अन्य ग्रामीण बुनियादी सुविधाओं से जुड़े कार्यों में स्थानीय स्तर पर सहयोग करें। यह सोच अपने आप में महत्वपूर्ण थी, क्योंकि इससे स्वच्छता को केवल शौचालय निर्माण तक सीमित न रखकर ग्रामीण विकास के व्यापक कार्यक्रम से जोड़ने का प्रयास दिखाई देता है।दिल्ली की त्रिलोकपुरी और मंगलापुरी जैसी पुनर्वास कॉलोनियों में बायोगैस आधारित सामुदायिक शौचालय परिसरों की पहल भी इसी सोच का हिस्सा थी। इसमें स्वच्छता, ऊर्जा और पर्यावरण को एक साथ जोड़ने का प्रयास किया गया। मानव मल को केवल अपशिष्ट मानने के बजाय उसके वैज्ञानिक प्रबंधन और उपयोग की संभावनाओं पर भी विचार किया गया।
इस अभियान के सामने केवल राजनीतिक इच्छा शक्ति की चुनौती नहीं थी। वित्तीय और प्रशासनिक व्यवस्था भी एक बड़ी बाधा थी। उस समय सरकारी मॉडल में 45 प्रतिशत सब्सिडी, 50 प्रतिशत ऋण और 5 प्रतिशत लाभार्थी योगदान का प्रावधान था। डॉ. पाठक का तर्क था कि अत्यंत गरीब परिवारों से 5 प्रतिशत नकद योगदान लेना भी योजना की गति को प्रभावित कर सकता है। उन्होंने सुझाव दिया कि लाभार्थी का 5 प्रतिशत योगदान समाप्त करके उसे ऋण में शामिल किया जाए और 45 प्रतिशत सब्सिडी तथा 55 प्रतिशत ऋण का मॉडल अपनाया जाए।
एक अन्य समस्या केंद्र से राज्यों और फिर स्थानीय निकायों तक धन के हस्तांतरण में होने वाली देरी की थी। यदि स्वच्छता योजनाओं के लिए स्वीकृत धन समय पर स्थानीय स्तर तक नहीं पहुंचे, तो तकनीक और राजनीतिक इच्छा के बावजूद कार्यक्रम आगे नहीं बढ़ सकता था। इससे स्पष्ट होता है कि मैला ढोने की प्रथा समाप्त करने की चुनौती केवल कानून बनाने या शौचालय बनाने की नहीं थी। इसके लिए तकनीक, वित्त, प्रशासन, पुनर्वास और सामाजिक चेतना सभी को एक साथ आगे बढ़ाना आवश्यक था।
चंद्रशेखर सरकार के कार्यकाल में सामने रखी गई आठवीं पंचवर्षीय योजना के प्रमुख मोहन धारिया ने इस योजना के अंत तक मैला ढोने की प्रथा समाप्त करने तथा प्रत्येक वर्ष लगभग 500 कस्बों में सूखे शौचालयों को कम लागत वाले पोर-फ्लश शौचालयों में बदलने का लक्ष्य रखा था। वही डॉ बिंदेश्वर पाठक को योजना आयोग के मैला ढोने की प्रथा से जुड़े टास्क फोर्स का सदस्य बनाया गया।
इस लक्ष्य का महत्व केवल संख्या में नहीं था। महत्वपूर्ण यह था कि सदियों पुरानी सामाजिक समस्या को एक समयबद्ध राष्ट्रीय कार्यक्रम के रूप में देखने की कोशिश की जा रही थी। डॉ. बिंदेश्वर पाठक ने इस अभियान में तकनीकी समाधान, संगठन और सामाजिक पुनर्वास के सवालों को लगातार उठाया। चंद्रशेखर ने इसे प्रधानमंत्री के स्तर पर राजनीतिक महत्व देकर यह संकेत दिया कि सफाई कर्मचारियों की गरिमा का प्रश्न सरकार की प्राथमिकताओं से बाहर नहीं हो सकता।

23 मार्च 1991 को राष्ट्रपति भवन के दरबार हॉल में आयोजित समारोह में राष्ट्रपति आर. वेंकटरामन ने डॉ. बिंदेश्वर पाठक को पद्म भूषण से सम्मानित किया। यह सम्मान सफाई कर्मचारियों को सिर पर मानव मल ढोने की प्रथा से मुक्त कराने, उनके सामाजिक उत्थान और प्रशिक्षण तथा सुलभ की जल-सील तकनीक के माध्यम से स्वच्छता और पर्यावरण के क्षेत्र में किए गए कार्यों के लिए दिया गया था।
चंद्रशेखर सरकार के कार्यकाल में इस मुद्दे को मिली राजनीतिक प्राथमिकता और डॉ. पाठक के लंबे सामाजिक अभियान का यह एक महत्वपूर्ण पड़ाव था।
मैला ढोने की प्रथा के खिलाफ राजनीतिक और सामाजिक दबाव आगे भी जारी रहा। 1993 में Employment of Manual Scavengers and Construction of Dry Latrines (Prohibition) Act लागू किया गया। हालांकि इसके क्रियान्वयन में गंभीर सीमाएं सामने आईं। इन अनुभवों के बाद 2013 में Prohibition of Employment as Manual Scavengers and their Rehabilitation Act अस्तित्व में आया। 2013 के कानून ने केवल मैला ढोने के रोजगार पर प्रतिबंध लगाने तक खुद को सीमित नहीं रखा, बल्कि इससे जुड़े लोगों के पुनर्वास को भी कानूनी ढांचे का हिस्सा बनाया। लेकिन कानून बन जाना समस्या के अंत की गारंटी नहीं था। सीवर और सेप्टिक टैंक की असुरक्षित सफाई, सफाईकर्मियों की मौतें और सामाजिक भेदभाव यह बताते हैं कि इस लड़ाई में कानून के साथ-साथ आधुनिक तकनीक, प्रशासनिक जवाबदेही और सामाजिक चेतना की भी आवश्यकता है।
भारत में स्वच्छता और सामाजिक गरिमा का प्रश्न किसी एक व्यक्ति या एक आंदोलन से नहीं जुड़ा है। महात्मा गांधी ने सफाई और अस्पृश्यता के प्रश्न को राष्ट्रीय आंदोलन के नैतिक विमर्श का हिस्सा बनाया। डॉ. भीमराव अंबेडकर ने जातिगत भेदभाव और सामाजिक असमानता के खिलाफ संघर्ष को संवैधानिक अधिकारों और सामाजिक लोकतंत्र के केंद्र में रखा। समाजवादी आंदोलन ने सामाजिक न्याय को राजनीतिक परिवर्तन का आधार बनाया। डॉ. बिंदेश्वर पाठक ने तकनीक, संगठन और सामाजिक अभियान के माध्यम से मैला ढोने की प्रथा के खिलाफ व्यावहारिक विकल्प प्रस्तुत किया। चंद्रशेखर ने प्रधानमंत्री के रूप में इस उपेक्षित सामाजिक प्रश्न को सत्ता और नीति के सर्वोच्च स्तर तक पहुंचाने का प्रयास किया। यही उनकी भूमिका को महत्वपूर्ण बनाता है।
मैला ढोने की प्रथा के खिलाफ चंद्रशेखर की पहल इसी संदर्भ में देखी जानी चाहिए। स्वच्छ भारत का असली अर्थ केवल सुंदर शहर नहीं, बल्कि इंसानी मल उठाने जैसी अमानवीय प्रथा का पूर्ण अंत है। आधुनिक तकनीक, मशीनी सफाई, कड़े कानून और पुनर्वास के जरिए इस सामाजिक कलंक को मिटाना ही होगा। मानव गरिमा की रक्षा और सबसे कमजोर नागरिक का सम्मान ही लोकतंत्र की असली परीक्षा है।

लेखक: मोहम्मद इरफान ऊर्फी
पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर जी के वैचारिक विषयों के शोधार्थी एवं पेशे से फार्मास्यूटिकल मैन्युफैक्चरिंग में क्वालिटी कंट्रोल मैनेजर।
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