लिख रही है आज कविता,
लिपि,
अजी !
चुपचाप रहिए |
छंद के उजले शहर में
भाव आते हैं,
सो रही अनुभूतियों को
आ जगाते हैं,
सज रही है अक्षरों से,
कृति,
अजी ! चुपचाप रहिए |
वर्ण के संसाधनों से
शब्द छंदित हैं,
वास्तविकता के अलंकृत
अब्द रंजित हैं,
नाचता है व्यंजना का,
शिखि,
अजी ! चुपचाप रहिए |
गुनगुनाहट की गली से
लय निकलती है,
साँझ-वन से साधना की
जय निकलती है,
क्षितिज पर लेटी हुई है,
क्षिति,
अजी ! चुपचाप रहिए |
अभी उपसंहार के हर
लघु कहन के पल,
ढूँढ़ते हर समस्या का
भव्य सक्षम हल,
बंद अंतिम रच रही है,
इति,
अजी ! चुपचाप रहिए |