नई दिल्ली। गुरुवार को राज्य मंत्री कीर्ति वर्धन सिंह ने बताया कि ब्रह्मपुत्र नदी पर चीन की परियोजनाओं पर भारत की कड़ी नजर है। उन्होंने ये बात राज्यसभा में एक लिखित जवाब में कहा। सिंह ने कहा कि भारत चीन द्वारा जलविद्युत परियोजनाएं विकसित करने की योजना पर ध्यान दे रहा है
और अपने हितों की सुरक्षा के लिए आवश्यक कदम उठा रहा है।
केंद्र सरकार ब्रह्मपुत्र नदी पर बांध बनाने की चीन की सभी चालबाजियों पर बारीकी से नजर रख रही है। राज्यसभा में विदेश राज्यमंत्री कीर्ति वर्धन सिंह ने बताया कि चीन की हाईड्रोपावर परियोजनाओं समेत सभी गतिविधियों पर पूरी सजगता के साथ निगरानी की जा रही है। सरकार देश के हितों की रक्षा के लिए सतर्क है। सरकार अपने हितों की रक्षा के लिए सीमा पार नदियों के मुद्दे पर चीन के साथ लगातार बातचीत कर रही है।
विदेश राज्यमंत्री ने लिखित जवाब में कहा, भारत सरकार ने तिब्बत में यारलुंग त्सांगपो (ब्रह्मपुत्र की ऊपरी पहुंच) नदी के निचले इलाकों में एक विशाल बांध परियोजना को मंजूरी दिए जाने की चीन की घोषणा पर गौर किया है। सरकार ब्रह्मपुत्र नदी से संबंधित सभी घटनाक्रमों पर सावधानीपूर्वक नजर रख रही है, इसमें चीन की हाइड्रोपावर परियोजनाएं विकसित करने की योजना भी शामिल है। साथ ही, वह निचले इलाकों में रहने वाले भारतीय नागरिकों के जीवन और आजीविका की सुरक्षा के लिए निवारक और सुधारात्मक उपायों सहित अपने हितों की रक्षा के लिए आवश्यक कदम उठाती है।
सीमापार नदियों के मुद्दे पर 2006 में स्थापित तंत्र के तहत होती है वार्ता
मंत्री ने कहा कि सीमा पार नदियों से संबंधित विभिन्न मुद्दों पर चीन के साथ संस्थागत विशेषज्ञ स्तरीय तंत्र के तहत चर्चा की जाती है, जिसकी स्थापना 2006 में की गई थी, साथ ही राजनयिक चैनलों के माध्यम से भी चर्चा की जाती है। उन्होंने कहा, सीमा पार की नदियों के पानी पर पर्याप्त स्थापित उपयोगकर्ता अधिकारों वाले एक निचले तटवर्ती राज्य के रूप में, सरकार ने लगातार चीनी अधिकारियों को अपने विचार और चिंताओं से अवगत कराया है। उनसे यह सुनिश्चित करने का आग्रह किया है कि ऊपरी क्षेत्रों में किसी भी गतिविधि से निचले राज्यों के हितों को नुकसान न पहुंचे।
मंत्रालय से पूछे गए थे ये सवाल
विदेश मंत्रालय से पूछा गया था कि क्या यह सच है कि भारत ने जल प्रवाह और पारिस्थितिकी स्थिरता पर पड़ने वाले प्रभाव के बारे में चिंता जताने के बावजूद चीन ने यारलुंग त्सांगपो पर एक विशाल जलविद्युत परियोजना के निर्माण को मंजूरी दे दी है। यह भी पूछा गया था कि अगर ऐसा है तो भारत की ओर से किए गए राजनयिक दखल और उस पर चीन की प्रतिक्रिया क्या थी। साथ ही अरुणाचल प्रदेश और असम में जल उपलब्धता, गाद जमाव और जैव विविधता पर इसके संभावित परिणाम क्या होंगे। सरकार की प्रस्तावित शमन रणनीति क्या होगी।
भारत और चीन के बीच बातचीत जारी
कीर्ति वर्धन सिंह ने आगे कहा कि भारत सरकार ने इस परियोजना को लेकर चीन को अपनी चिंताओं से अवगत कराया है। साथ ही पारदर्शिता तथा निचले देशों के साथ परामर्श की आवश्यकता पर जोर दिया है। उन्होंने बताया कि भारत और चीन के बीच इस मुद्दे पर बातचीत जारी है और 2025 में विदेश सचिव की बीजिंग यात्रा के दौरान यह मुद्दा उठाया गया था।
चिंताओं पर विमर्श के लिए भारत सख्त
सिंह ने आगे कहा कि भारत ने चीन से यह सुनिश्चित करने को कहा कि तिब्बत में किसी भी प्रकार की गतिविधि से डाउनस्ट्रीम राज्यों के हितों को कोई नुकसान न पहुंचे। उन्होंने कहा कि भारत ने इस परियोजना के प्रभावों को ध्यान में रखते हुए अरुणाचल प्रदेश में 10 गीगावाट की जलविद्युत परियोजना की योजना बनाई है, जिसका उद्देश्य जल सुरक्षा, बाढ़ नियंत्रण और क्षेत्रीय आर्थिक विकास को सुनिश्चित करना है। इसके साथ ही भारत ने साथ ही चीन के साथ जलवायु डेटा साझाकरण और सहयोग को फिर से शुरू करने पर चर्चा करने के लिए एक बैठक आयोजित करने पर सहमति जताई है।
मछुआरों की श्रीलंका में गिरफ्तारी की समस्या विरासत में मिली : जयशंकर
श्रीलंका में हिरासत लिए भारतीय मछुआरों का मुद्दा बृहस्पतिवार को संसद में उठा। राज्यसभा में इससे जुड़े सवाल का जवाब देते हुए विदेश मंत्री एस जयशंकर ने कहा कि वर्तमान मोदी सरकार को साल 1974 और 1976 की घटनाओं के कारण यह समस्या विरासत में मिली है।
द्रमुक सांसद तिरुचि शिवा के सवाल का जवाब देते हुए जयशंकर ने कहा, श्रीलंका में दो कानून हैं। पहला, मत्स्य पालन और जलीय संसाधन अधिनियम, 1996 और दूसरा, मत्स्य विनियमन अधिनियम, 1979। इन दोनों कानूनों को 2018 और 2023 में संशोधित किया गया। इसके बाद इसमें अधिक कठोर सजा, ज्यादा जुर्माना और हिरासत का प्रावधान शामिल किया गया। श्रीलंका की जेलों में सजा काट रहे भारतीय मछुआरों में से कई लोग नौकाओं के मालिक, कप्तान या बार-बार अपराध करने वाले हैं। इसके चलते समस्या और जटिल होती जा रही है।
1974 में खींची गई अंतरराष्ट्रीय समुद्री सीमा
जयशंकर ने कहा, भारतीय मछुआरों को श्रीलंका में हिरासत में लेने का मूल कारण साल 1974 में शुरू हुआ, जब अंतरराष्ट्रीय समुद्री सीमा रेखा खींची गई। वर्ष 1976 में श्रीलंका के साथ मछली पकड़ने के अधिकार क्षेत्र को निर्धारित करने के लिए दोनों देशों के बीच पत्रों का आदान-प्रदान हुआ। सदन को मालूम है कि एक तरह से हमारी सरकार को यह समस्या विरासत में मिली है। श्रीलंका में हिरासत में लिए गए ज्यादातर मछुआरे तमिलनाडु व पुड्डुचेरी से हैं।