नई दिल्ली । कोरोना महामारी के दौरान में जहां लंबित मुकदमों की संख्या 3.5 करोड़ से बढ़कर 4.1 करोड़ हो गई है, वहीं जजों की संख्या में गिरावट आई है। इससे साफ है कि आने वाले दिनों में अदालतें मुकदमों के बोझ तले और दबेंगी। देश की सर्वोच्च अदालत में लगभग 60 हजार केस लंबित हैं, लेकिन यहां जजों की संख्या उत्तरोत्तर कम होती जा रही है। पिछले डेढ़ वर्ष में उच्चतम न्यायालय में एक भी न्यायाधीश की नियुक्ति नहीं हुई है।

मौजूदा समय में शीर्ष अदालत में जजों की आठ रिक्तयां हैं। अगले माह 18 अगस्त तक यह संख्या बढ़कर दस हो जाएगी, क्योंकि दो जज जस्टिस आरएफ नरीमन और नवीन सिन्हा सेवानिवृत्त हो रहे हैं। इस प्रकार उच्चतम न्यायालय में 30 फीसदी से ज्यादा रिक्तियां हो जाएंगी। हाल के वर्षों में यह पहली बार होगा, जब शीर्ष अदालत में न्यायाधीशों की दस रिक्तियां होंगी। सर्वोच्च अदालत में मुख्य न्यायाधीश समेत जजों के 34 पद स्वीकृत हैं।

सूत्रों के मुताबिक उच्च न्यायालयों में जजों की नियुक्ति करने वाले चयन मंडल यानी कॉलेजियम की प्रभावी बैठक भी पिछले कई माह से नहीं हुई है। कॉलेजियम की जो भी बैठकें हुई हैं, उनमें न्यायाधीशों की नई नियुक्तियों के प्रस्ताव नहीं, बल्कि उच्च न्यायालय में पुरानी नियुक्तियों को ही स्थाई करने के प्रस्ताव पारित हुए हैं। हालांकि, सूत्रों ने बताया कि नियुक्ति प्रक्रिया जल्द ही जोर पकड़ेगी। जजों के सभी पद भर लिए जाएंगे।


देश के 25 उच्च न्यायालयों में 50 लाख से ज्यादा केस लंबित हैं। उच्च न्यायालय जजों के कुल स्वीकृत पदों के मुकाबले 59 फीसदी संख्या के साथ ही काम कर रहे हैं। यहां 449 जजों की रिक्तियां हैं, जो कुल संख्या का 41 फीसदी है। सबसे बुरी स्थिति निचली अदालतों की है, जहां खाली पदों की संख्या बढ़कर 6000 से ज्यादा हो गई है, जो कुल संख्या का 26 फीसदी है। निचली अदालतों में न्यायिक अधिकारियों के लगभग 26000 पद हैं। यहां लंबित मुकदमे भी सबसे ज्यादा 3.5 करोड़ हैं।