नई दिल्ली | आप अगर जीवन बीमा लेने जा रहे हैं तो छोटी से छोटी बीमारी की जानकारी भी न छुपाएं। भले ही बुखार, पीलिया, कब्ज जैसी छोटी बीमारियां ही क्यों न हो। अन्यथा आपके परिजन बीमा के लाभ से वंचित रह जाएंगे। ऐसे ही एक मामले में दिल्ली राज्य उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग ने बीमारियों की जानकारी छुपाने के आधार पर भारतीय जीवन बीमा निगम (एलआईसी) द्वारा पॉलिसी धारक की मौत के बाद परिजनों को बीमा का लाभ न दिए जाने को सही ठहराया है।

आयोग की अध्यक्ष जस्टिस संगीता ढींगरा सहगल और सदस्य अनिल श्रीवास्तव की अगुवाई वाली बेंच ने फैसले में कहा है कि बीमा धारक की ओर से पॉलिसी लेते वक्त बीमारियों की जानकारी छुपाना, बीमा शर्तों का उल्लंघन है। पीठ ने कहा कि यह इसलिए जरूरी है कि इसके आधार पर ही बीमा कंपनी जोखिम का अंदाजा लगाकर यह तय करती है कि बीमा धारक को बीमा दिया जाए या नहीं।

आयोग ने कहा कि ऐसे में गलत जानकारी देने के आधार पर बीमा कंपनी को बीमा अनुबंध को रद्द करने और इसके प्रीमियम को जब्त करने का अधिकार है। राज्य उपभोक्ता आयोग ने जिला उपभोक्ता फोरम के उस फैसले को रद्द कर दिया, जिसमें बीमा कंपनी से शिकायतकर्ता को दो बीमा का लाभ और मुआवजा देने का आदेश दिया गया था। आयोग ने फोरम के फैसले के खिलाफ भारतीय जीवन बीमा निगम की ओर से दाखिल अपील पर यह फैसला दिया है।

दो जीवन बीमा पॉलिसी ली थी : सुरेंद्र कुमार ने एलआईसी से 2006 और 2007 में दो लाख और तीन लाख की दो जीवन बीमा पॉलिसी ली। उन्होंने समय से इसका प्रीमियम भरना शुरू कर दिया, लेकिन बीमा लेने के तीन साल के भीतर 2008 में उनकी मौत हो गई। इसके बाद उनकी पत्नी संतोष ने बीमा का लाभ देने की मांग की, लेकिन कंपनी ने इनकार कर दिया।

कंपनी ने ये दलीले दीं

कंपनी ने मामले की सुनवाई के दौरान बेंच को बताया कि बीमा लेते वक्त सुरेंद्र कुमार ने अपनी बीमारियों को छुपाया। कंपनी ने बताया कि बीमा धारक वर्ष 2000 से ही बुखार, पीलिया और लगातार कब्ज की बीमारी से पीड़ित थे। कंपनी ने बताया कि इन बीमारियों के चलते वे एक निजी अस्पताल में भर्ती भी हुए थे। उनके पेट की एक सर्जरी भी हुई थी।